1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)
क्रांति-पूर्व युग (1948–1979)
इस दौरान दोनों देशों के संबंध सौहार्दपूर्ण और सहयोगात्मक थे। ईरान (पहलवी राजवंश के तहत) तुर्की के बाद इजराइल को मान्यता देने वाला दूसरा मुस्लिम बहुल देश था। दोनों देश ‘परिधीय सिद्धांत’ (Periphery Doctrine) के तहत अरब राष्ट्रवाद का मुकाबला करने के लिए साथ थे।
1979 की इस्लामी क्रांति
आयतुल्लाह खामेनेई के नेतृत्व में ईरान एक इस्लामी गणराज्य बना। नई सरकार ने इजराइल को एक ‘अवैध देश’ (Little Satan) घोषित किया और फिलिस्तीनी मुद्दे को अपनी विदेश नीति का मुख्य स्तंभ बना लिया।
2. प्रतिद्वंद्विता के मुख्य कारण (Core Drivers of the Conflict)
वैचारिक टकराव (Ideological Conflict)
ईरान इजराइल के अस्तित्व का विरोध करता है और खुद को इस्लामी दुनिया में ‘उत्पीड़ितों का रक्षक’ मानता है। वहीं इजराइल, ईरान को अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है।
क्षेत्रीय वर्चस्व (Regional Hegemony)
मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ाने के लिए दोनों के बीच संघर्ष है। ईरान अपनी “प्रतिरोध की धुरी” (Axis of Resistance) के जरिए प्रभाव फैलाता है, जबकि इजराइल अमेरिकी समर्थन से इसे रोकने का प्रयास करता है।
परमाणु आयाम (Nuclear Dimension)
इजराइल का मानना है कि एक परमाणु-सशस्त्र ईरान उसके अस्तित्व को समाप्त कर सकता है। इसे रोकने के लिए इजराइल ने ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों को निशाना बनाया है और साइबर हमले (जैसे Stuxnet) किए हैं।
3. छद्म युद्ध से प्रत्यक्ष युद्ध (Proxy War to Direct Conflict)
दशकों तक यह संघर्ष अप्रत्यक्ष रहा, लेकिन हालिया घटनाक्रमों (2024–2026) ने इसे सीधे युद्ध में बदल दिया है।
ईरान के प्रॉक्सी: प्रतिरोध की धुरी (Axis of Resistance)
ईरान सीधे लड़ने के बजाय क्षेत्रीय गुटों को धन और हथियार देता है। इसमें लेबनान का हिजबुल्लाह, गाजा का हमास, और यमन के हुथी विद्रोही शामिल हैं।
प्रत्यक्ष सैन्य टकराव (Direct Military Confrontation)
हाल के वर्षों में दमिश्क (सीरिया) में ईरानी वाणिज्य दूतावास पर हमले और उसके बाद ईरान द्वारा इजराइल पर सीधे मिसाइल व ड्रोन हमलों ने इस छाया युद्ध (Shadow War) को समाप्त कर आमने-सामने की जंग में बदल दिया है।
4. भारत पर प्रभाव (Implications for India)
भारत “रणनीतिक स्वायत्तता” (Strategic Autonomy) की नीति अपनाता है क्योंकि उसके दोनों देशों के साथ गहरे हित जुड़े हैं।
ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security)
भारत अपनी तेल और गैस जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के अवरुद्ध होने से तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।
रणनीतिक गलियारे (Strategic Corridors)
इस तनाव से IMEC (भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा) की प्रगति खतरे में पड़ गई है। साथ ही चाबहार बंदरगाह और INSTC (अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा) पर भी असर पड़ सकता है।
प्रवासी भारतीय (Diaspora)
मध्य पूर्व में लगभग 90 लाख भारतीय रहते हैं। युद्ध बढ़ने से उनकी सुरक्षा और भारत में आने वाले प्रेषण (Remittance) पर सीधा असर पड़ेगा।
राजनयिक संतुलन (Diplomatic Balance)
भारत के इजराइल के साथ मजबूत रक्षा और तकनीकी संबंध हैं, जबकि ईरान के साथ ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध (चाबहार) हैं। भारत को दोनों के बीच संतुलन बनाना होगा।
5. आगे की राह (Way Forward)
राजनयिक समाधान (Diplomatic Resolution)
क्षेत्रीय शक्तियों (जैसे सऊदी अरब, यूएई) और वैश्विक शक्तियों (यूएन, अमेरिका, चीन) को मिलकर होर्मुज़ और लाल सागर जैसे व्यापारिक मार्गों को सुरक्षित करने के लिए मध्यस्थता करनी होगी।
भारत की भूमिका (India’s Role)
भारत अपनी तटस्थ और विश्वसनीय छवि का उपयोग करके दोनों पक्षों को तनाव कम करने (De-escalation) के लिए प्रेरित कर सकता है। साथ ही भारत को अपनी ऊर्जा आपूर्ति में विविधता लाने के लिए ईस्टर्न मेरीटाइम कॉरिडोर (EMC) जैसे वैकल्पिक मार्गों को मजबूत करना चाहिए।