हाल ही में नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह (“बालेन”) ने कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुराके सीमा विवाद पर संसदीय चर्चा में टिप्पणी करते हुए इसे एकतरफा मुद्दा न मानकर द्विपक्षीयबताया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अतिक्रमण के आरोप केवल भारत पर नहीं लगाए जा सकते, बल्कि दोनों देशों को तथ्यों की निष्पक्ष जांच कर कूटनीतिक और मित्रतापूर्ण तरीके से समाधान खोजना चाहिए।

विवाद के मुख्य बिंदु
वर्तमान भारत-नेपाल संबंधों में मुख्य रूप से सीमा और व्यापार मार्गों को लेकर कुछ आपत्तियां और विवाद हैं:
- कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा विवाद: ये तीनों क्षेत्र दोनों देशों के बीच लंबे समय से विवाद का कारण बने हुए हैं। नेपाल ने इन क्षेत्रों पर अपना दावा जताते हुए अपने मुद्रा नोटों और आधिकारिक मानचित्रों पर इन्हें शामिल किया है, जबकि भारत 1947 से चली आ रही सीमांकन पद्धति और अपनी गंभीर सुरक्षा चिंताओं के आधार पर यथास्थिति बनाए हुए है।
- व्यापार और तीर्थयात्रा मार्गों पर आपत्ति:नेपाल ने लिपुलेख दर्रे के माध्यम से होने वाले भारत-चीन व्यापारऔर कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्गपर आपत्ति जताई है। भारत ने इस दावे को ‘अनुचित’ और ‘एकतरफा कृत्रिम विस्तार’ कहकर खारिज कर दिया है।
Explainer: यह विवाद क्या है?
यह विवाद मुख्य रूप से 1816 की सुगौली संधि (Treaty of Sugauli)की अलग-अलग व्याख्याओं पर आधारित है। इस संधि के तहत महाकाली नदी को दोनों देशों की पश्चिमी सीमा माना गया था। विवाद इस बात पर है कि महाकाली नदी का उद्गम स्थल कहाँ है। नेपाल का दावा है कि नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से होता है, जिससे कालापानी और लिपुलेख नेपाल के हिस्से में आते हैं। वहीं, भारत का मानना है कि नदी का उद्गम कालापानी के पास से होता है, इसलिए यह क्षेत्र भारत (उत्तराखंड राज्य) का अभिन्न हिस्सा है।
नेपाल के बदलते राजनीतिक और कूटनीतिक आयाम
नेपाल की आंतरिक राजनीति और भारत के प्रति उसके दृष्टिकोण में स्पष्ट बदलाव देखे जा रहे हैं:
- युवा नेतृत्व का उदय:नेपाल की सत्ता और शासन व्यवस्था अब एक ऐसी युवा पीढ़ी के हाथ में आ रही है, जो वैचारिक पूर्वाग्रहों, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से मुक्त होकर सामाजिक और आर्थिक विकासको प्राथमिकता दे रही है।
- पारंपरिक “विशेष संबंधों” के प्रोटोकॉल में बदलाव: नेपाल अब भारत को पारंपरिक “विशेष तरजीह” (Special Relationship) देने के बजाय अन्य देशों के समकक्ष रखकर कूटनीतिक संबंध स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। शीर्ष नेतृत्व तक आसान पहुंच को सीमित करना इस नई सोच को दर्शाता है।
- तर्कसंगत कूटनीति:नेपाली नेतृत्व अब ‘तर्कहीन राष्ट्रवाद’ के बजाय तथ्य-आधारित और तर्कसंगत दृष्टिकोणअपना रहा है। द्विपक्षीय संबंधों को केवल प्रोटोकॉल या असमानता के दावों के अधीन नहीं रखा जा रहा है।
भारत नेपाल के विशेष रिश्तों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत और नेपाल के बीच संबंध मुख्य रूप से 1950 की भारत-नेपाल शांति और मित्रता संधि पर आधारित हैं। इसके तहत दोनों देशों के बीच ‘रोटी-बेटी का रिश्ता’ और 1,700 किलोमीटर से अधिक लंबी खुली सीमा है। इस संधि के कारण नेपाली नागरिकों को भारत में रोजगार, संपत्ति और निवास के समान अधिकार प्राप्त हैं।
आगे की राह (Way Forward)
भारत-नेपाल संबंधों को मजबूत करने और विवादों के स्थायी समाधान के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने आवश्यक हैं:
- द्विपक्षीय और तथ्य-आधारित समाधान:दोनों देशों को विशेषज्ञ-स्तरीय चर्चाओं को अनिश्चित काल तक खींचने के बजाय, कूटनीतिक स्तर पर शीघ्र समाधान खोजना चाहिए। नेपाल द्वारा चीन या ब्रिटेन जैसे तीसरे पक्ष को शामिल करने का सुझाव विवाद में अधिक जटिलता और देरी पैदा कर सकता है। चीन ने भी द्विपक्षीय समाधान का ही समर्थन किया है।
- ऐतिहासिक संबंधों और संस्थागत विश्वास का उपयोग:विवादों के समाधान के लिए दोनों देशों को अपने सदियों पुराने बहुआयामी संबंधों, खुली सीमा की परंपरा और भारतीय और नेपाली सेनाओं के बीच मौजूद मजबूत संस्थागत विश्वास से प्रेरणा लेनी चाहिए।
- मानसिकता में बदलाव:सीमांकन पर मतभेदों को समग्र और अद्वितीय द्विपक्षीय संबंधों पर हावी नहीं होने देना चाहिए। सीमा अतिक्रमण को जानबूझकर किए गए आक्रामक दावे के बजाय एक स्वाभाविक पारस्परिकता के रूप में देखने की आवश्यकता है।
- मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति:नेपाल में हो रहे राजनीतिक बदलाव भारत के लिए एक अवसर हैं। भारत के शीर्ष नेतृत्व को पारंपरिक नौकरशाही दृष्टिकोण और राष्ट्रवादी दिखावे से बाहर निकलकर, एक प्रबुद्ध और आदर्श स्थायी साझेदारी (Enlightened and Ideal Partnership)के निर्माण के लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और दूरदृष्टि दिखानी होगी।